Friday, 14 March 2008

रूमानी कविता: अपराध






















मैं
सच कहता हूं
मैंने एक अपराध किया है।
मैंने तुम्हें, हां तुम्हें ही
अपने दिल की दीवारों में
कैद कर लिया है।
अब हर क्षण
तुम्हारे केशों की सुगंध से
अपनी सांसें महकाया करता हूं।
नहीं पैदा हुआ कोई क्षण
जब मैंने तुम्हें
अपनी कल्पनाओं के पाश से
आजाद कर दिया हो।
न होगा कोई लम्हा
जब मैं अपनी
सपनों की लडियों से
तुम्हें अलहदा कर दूं।
पर शायद अब तक
तुम अनजान हो इससे
कि मैंने तुम्हें
तुमसे ही चुरा लिया है।
वैसे मुझे यह अधिकार भी
तुम्हारा ही दिया है।
मैं सच कहता हूं
मैंने एक अपराध किया है।

5 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

बहुत बढिया अभिव्यक्ति , सोचने पर मजबूर कर दिया !

अबरार अहमद said...

बहुत सुंदर।

रश्मि प्रभा said...

ek khubsurat apraadh.......

राज भाटिय़ा said...

जाकिर भाई हम तो तुम्हे बहुत शारीफ़ समझ्ते हे ,आज आप की यह सुन्दर कविता पढ कर पता चला आप तो छुपे रुसत्म निकले, धन्यवाद सुन्दर कविता के लिये, मजाक का बुरा न मानान

ई-गुरू माया said...

ऐसे अपराध तो माफ़ किए जा सकते हैं पर इस वादे के साथ कि आप फ़िर से करें. :)