Tuesday, 1 July 2008

बाल कहानी- इससे तो अच्छा..

करम बेटे, कहां जा रहे हो ? चलो पहले होमवर्क करो।

मम्‍मी की आवाज सुनकर करम का मूड ऑफ हो गया। कहां वह बैटबॉल लेकर खेलने जा रहा था और कहां यह होमवर्क। मन ही मन उसे होमवर्क पर बहुत गुस्सा आया। पर मम्‍मी का हुक्म तो मानना ही था। बैटबॉल को उसने एक ओर पटका और बस्ता लेकर पढने बैठ गया। उसने गणित की किताब से सवाल को कॉपी पर उतारा और उसे समझने की कोशिश करने लगा।

लेकिन करम का सारा ध्यान तो खेल में रखा था, इसलिए उसे सवाल समझ में नहीं आया। वह सोचने लगा काश कोई ऐसी मशीन होती, जो सारा होमवर्क कर देती...

देखते ही देखते करम कल्पना लोक में खो गया और जल्द ही उसे नींद ने आ घेरा।

अभी कुछ ही दिन पहले करम ने किसी बाल पत्रिका में पढा था वैज्ञानिकों को ऐसे रोबोट बनाने में सफलता मिली है, जो मनुष्य की तरह सभी काम करते हैं। वह समाचार याद आते ही उसके दिमाग में एक विचार कौंधा क्यों न एक ऐसा रोबोट बनाया जाए, जो उसका होमवर्क भी कर दे।

यह सोचकर करम रोमांचित हो उठा। अपनी सोच को अमली जामा पहनाने के लिए उसने लाइब्रेरी की शरण ली। वहां पर उसने रोबोट से सम्बंधित ढेर सारी किताबें पढीं। उन किताबों को पढने के बाद उसे विश्वास हो गया कि वह भी एक रोबोट बना सकता है। फिर क्या था उसने रोबोट बनाने के लिए सामान जुटाना शुरू कर किया।

सबसे पहले करम ने अपना गुल्लक निकाला। गुल्लक में ज्यादा पैसे नहीं थे। उतने रूपयों से रोबोट बनाने का आधा सामान भी नहीं मिला। अब वह क्या करे? और पैसे कहां से लाए? उसने सोचा कि वह अपने पापा से बात करे। लेकिन कहीं वे उसे उल्टा डांटने ही लगे तो? दूसरा रास्ता यह था कि वह मम्‍मी से बात करे। उसे यह तरीका सही लगा। उसने मम्‍मी का मूड देखकर अपने मन की बात कही, अम्मीजान, मैं एक रोबोट बनाना चाहता हूं।

अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है। मम्मी ने रोमांचित होकर पूछा, क्या तुम ऐसा कर पाओगे ?”

हां मम्मी, बस कुछ रूपयों की जरूरत है। करम ने पूरे विश्वास के साथ कहा, रोबोट का सामान लाना है। लेकिन जब तक रोबोट बन न जाए, आप ये बात किसी और को नहीं बताइएगा।

ठीक है, लेकिन इससे तुम्हारी पढाई नहीं गडबड होनी चाहिए।

जी मम्मी। करम ने वादा किया।

मम्‍मी को करम के ऊपर पूरा यकीन था। उन्होंने उसे जरूरत के मुताबिक रूपये दे दिये। करम ने मम्‍मी का शुक्रिया अदा किया और अपने काम में लग गया।

करम ने किताब में बताई गयी विधि के अनुसार कलपुर्जों को क्रम में जोडना शुरू कर दिया। इस काम में उसे काफी मेहनत करनी पडी। जहां कहीं पर वह अटक जाता, किताब की शरण में पहुंच जाता। किताब पढने के बाद उसकी सारी समस्या हल हो जाती। वह फिर से अपने काम में जुट जाता।

रोबोट के निर्माण में करम ने दिनरात एक कर‍ दिया। न उसने दिन को दिन समझा और न ही रात को रात। पढाई के अलावा उसके पास जितना समय बचता था, वह रोबोट के बनाने में लगा देता।

आखिर दो महीने बाद करम की मेहनत रंग लाई। जीतोड मेहनत के बाद उसका रोबोट तैयार हो गया। देखने में वह बिलकुल मशीनी मानव लगता था।

अपनी इस सफलता पर करम फूला नहीं समाया। उसने अपने ही नाम पर रोबोट का नाम राजू रखा। जब उसने मम्‍मीपापा को अपना रोबोट दिखाया, तो वे बहुत खुश हुए। उन्होंने करम की इस उपलब्धि पर उसे ढेर सारी बधाइयां दीं। दोस्तों ने तो रोबोट को देखकर दांतों तले उंगली ही दबा ली। मास्टर जी ने भी उसकी जीभर कर प्रशंसा की। सभी लोगों से अपनी तारीफ सुनकर करम फूला नहीं समाया।

अब रोबोट के टेस्ट की बारी थी। आखिरकार वह समय भी आ गया। करम ने रोबोट को आदेश दिया, जाओ राजू, मेरा होमवर्क हल करो।

अपने मालिक का हुक्म सुनने के बाद भी रोबोट शान्त रहा। यह देखकर करम का पारा चढ गया। उसने रोबोट को दुबारा आदेश दिया, राजू, तुमने सुना नहीं? मेरा होमवर्क करो।

पर रोबोट इस बार भी कुछ नहीं बोला। उसके पेट पर लगी स्क्रीन पर कोई संदेश लिख कर आ रहा था। करम ने उस संदेश पर ध्यान नहीं दिया। अपने आदेश की अवहेलना देखकर उसका शरीर क्रोध के कारण कांपने लगा। उसने गुस्से में एक झापड रोबोट के गाल पर रसीद कर दिया।

रोबोट लोहे का बना हुआ था। रोबोट के चोट लगने के बजाए करम का हाथ ही झन्ना गया। वह अपना हाथ पकड कर रह गया और रोबोट को बुराभला कहने लगा। तभी करम के मास्टर जी वहां आ गये। वे बोले, ये क्या कर रहे हो करम? तुम अपना गुस्सा रोबोट पर क्यों उतार रहे हो?”

मास्टर जी, ये रोबोट मेरा कहना ही नहीं मानता। करम ने अपनी झेंप मिटाने के लिए रोबोट पर इल्जाम मढा।

इसमें इसकी क्या गलती?” मास्टरजी ने रोबोट का पक्ष लिया।

गलती क्यों नहीं है मास्टर जी ?” करम ने सवाल किया, मैंने आखिर इसे होमवर्क करने के लिए ही तो बनाया है ?”

हां, पर तुमने सिर्फ एक लोहे का ढांचा बनाया है। अगर तुम चाहते हो कि यह रोबोट सवाल भी करे, तो तुम्हें इसके मस्तिष्क में प्रोग्राम करके गणित के सूत्र भी डालने होंगे। और यह बहुत मुश्किल काम है।

मुश्किल काम है?” मास्टर जी की बात सुनकर करम हताश हो गया। उसने बुझे मन से पूछा, इसमें कितना समय लग सकता है ?”

इसमें दोतीन साल भी लग सकता है। इसके लिए तुम्हें बहुत सारी किताबें पढनी होंगी, प्रोग्रामिंग सीखनी होगी, सवालों के सूत्रों को कोड में बदलना होगा, फिर उन्हें रोबोट के मस्तिष्क में...

रहने दीजिए मास्टर जी, करम ने मास्टर जी की बात बीच में ही काट दी, इससे तो अच्छा है कि मैं अपने सवाल खुद ही लगा लूं।

और तभी करम की नींद टूट गयी। ये क्या? क्या वह सपना देख रहा था? हां, वह तो मेज पर बैठाबैठा सो रहा था। मम्‍मी के पैरों की आहट सुनकर उसकी नींद टूटी थी। कुछ ही पलों में मम्‍मी पास आ गयीं। वे बोलीं, क्या सोच रहे हो बेटा?”

ज...जी कुछ नहीं। करम चौंकते हुए बोला और फिर सवाल लगाने में व्यस्त हो गया। ताकि उसके बाद वह आराम से खेलने के लिए जा सके।

Monday, 19 May 2008

बालगीत: कोई परी कहानी


बेटा तुम्हें सुनाऊं कैसे कोई परी कहानी ?
मुझको चिंता घेरे कैसे आए राशन पानी।।

घर में चावलदाल नहीं है, गैस बजाए ताली।
मंहगाई से डरी पड़ी है, डलिया सब्ज़ी वाली।

भूखे पेट भजन होता, बात है बड़ी पुरानी।
मुझको चिंता घेरे कैसे आए राशन पानी।।

बहन तेरी बीमार पड़ी है आए उसे बुखार।
बापू श्री के सिर में दर्द है बीत गये दिन चार।

तुझको भी तो लगी हुई है खांसी आनीजानी।
मुझको चिंता घेरे कैसे आए राशन पानी।।

फीस अगर जमा हुई तो नाम तेरा कट जाए।
एक महीने की तनख्वाह, दो दिन में बंट जाए।

बिन पैसों के मिले नहीं है, यहां बूद भी पानी।
मुझको चिंता घेरे कैसे आए राशन पानी।।

Thursday, 3 April 2008

अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कार

"ऐतिहासिक बाल कथाएं" पर प्रदत्त अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारदिनांक 16 मार्च 2008 को भोपाल में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रख्यात साहित्यकार श्री विष्णु नागर की उपस्थिति में यह सम्मान प्रदान किया गया।

Friday, 14 March 2008

रूमानी कविता: अपराध






















मैं
सच कहता हूं
मैंने एक अपराध किया है।
मैंने तुम्हें, हां तुम्हें ही
अपने दिल की दीवारों में
कैद कर लिया है।
अब हर क्षण
तुम्हारे केशों की सुगंध से
अपनी सांसें महकाया करता हूं।
नहीं पैदा हुआ कोई क्षण
जब मैंने तुम्हें
अपनी कल्पनाओं के पाश से
आजाद कर दिया हो।
न होगा कोई लम्हा
जब मैं अपनी
सपनों की लडियों से
तुम्हें अलहदा कर दूं।
पर शायद अब तक
तुम अनजान हो इससे
कि मैंने तुम्हें
तुमसे ही चुरा लिया है।
वैसे मुझे यह अधिकार भी
तुम्हारा ही दिया है।
मैं सच कहता हूं
मैंने एक अपराध किया है।

Monday, 10 March 2008

राष्ट्रीय संगोष्टी: श्रेष्ठ शोधपत्र पुरस्कार

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एन.सी.एस.टी.सी.), द्वारा देहरादून में 20-23 फरवरी को "रचनात्मक विधाओं द्वारा विज्ञान संचार" विषयक चार दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्टी में श्रेष्ठ शोधपत्र के पुरस्कार से सम्मानित। वैज्ञानिक एवं अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक प्रो0 श्रीकृष्ण जोशी पुरस्कार प्रदान करते हुए।

Tuesday, 26 February 2008

विज्ञान कथा- ज़रूरत

कम्प्यूट्रीकृत हालनुमा प्रयोगशाला के एक कोने में दो जोड़ी आंखें लगातार एक स्क्रीन पर जमी हुई थीं। उस सुपर कम्प्यूटर की अन्त:निहित शक्ति अपने बगल में स्थित एक सतरंगे ग्लोबनुमा मशीन की जांच करने में व्यस्त थी। लगभग आठ फिट व्यास का वह सतंरगा ग्लोब अपने गर्भ में अनन्त संभावनाएं छिपाए हुए था। उन्हीं संभावनाओं की तह तक पहुंचने में व्यस्त था सुपर कम्प्यूटर।
परिणाम की प्रतीक्षा में गड्ढे में धंसी जा रही वे दो जोड़ी आंखें आकाश की तरह शान्त थीं। अबाध गति से धड़कते हृदय और अनियंत्रित गति से चलती सांसें भी उनकी एकाग्रता को भंग करने में समर्थ न हो सकी थीं।
“देखा विजय, हम जीत गये।” अगले ही क्षण प्रोफेसर यासीन ने हाल की निस्तब्धता तार–तार कर दी, “समय की अबाध गति पर हमारे ‘समययान’ ने विजय हासिल कर ली। अब हम समय की सीमा को चीरकर किसी भी काल, किसी भी समय में बड़ी आसानी से जा सकते हैं।”
वर्षों की शरीर झुलसा देने वाली कठिन तपस्या के फल को प्राप्त होने से प्रोफेसर के सूख चुके शरीर में चमक आ गयी थी। इस महान सफलता से उत्पन्न प्रसन्नता को वे संभाल नहीं पा रहे थे।
“मुबारक हो सर, आज आपकी वर्षों की मेहनत सफल हो गयी। आपका यह आविष्कार नि:संदेह मानव कल्याण में उपयोगी सिद्ध होगा।” प्रोफेसर के सहायक विजय ने भी अपनी भावनाओं पर लगाम लगाना उचित न समझा।
“धन्यवाद विजय, पर ये मत भूलो कि इस महान सफलता में तुम्हारा भी बराबर का योगदान है।”
“ये तो आपका बड़प्पन है सर, वर्ना मैं क्या और मेरा...।” विजय अपने आप पर ही हंस पड़ा।
एक बार फिर प्रोफेसर यासीन अपने सहयोगी विजय के साथ अपनी यात्रा की तैयारी में व्यस्त हो गये। एक ऐसी यात्रा, जो वर्तमान से भविष्य की ओर जाती थी। एक खूबसूरत कल्पना, जो हकीकत में बदलने जा रही थी और जुड़ने वाला था मानवीय उपलब्धियों के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय।
वातावरणीय परिवर्ततनों को ध्यान में रखते हुए प्रोफेसर ने एक विशेष प्रकार की स्वनिर्मित पोशाक पहन ली थी। अब वे किसी अन्तरिक्ष यात्री की भांति लग रहे थे, जो किसी नवीन ग्रह की खोज में अनन्त आकाशगंगा में प्रवेश करने वाला हो।
उस आठ फुटे सतरंगे समययान में जैसे ही प्रोफेसर ने कदम रखा, उनका शरीर रोमांचित हो उठा। अंदर पहुंचते ही उन्होंने कम्प्यूटर को ऑन कर दिया। आहिस्ते से समययान धरती से आधा फिट की ऊंचाई पर उठा और उसका सतरंगा आवरण तेजी से घूमने लगा। सतरंगी पटिटयां धीरे–धीरे मिलकर सफेद हुईं और फिर अदृश्य। पर अंदर सब कुछ स्थिर था। घूम रहा था तो सिर्फ समय–चक्र, बड़ी तेजी से आगे की ओर। 2000-2050-2100-2300। सब कुछ पीछे छूटता जा रहा था। पीछे और पीछे, तेज़, बहुत तेज़, समय से भी तेज़।
कम्प्यूटर द्वारा पूर्व निर्धारित समय चक्र 2500 ईस्वी पर पहुंच कर थम गया। प्रोफेसर ने कलाई घड़ी पर नज़र दौड़ाई। शाम के पांच बजकर 25 मिनट 40 सेकेण्ड। यानि कि मात्र दस सेकेण्ड में ही 1900 से 2500 की यात्रा सम्पन्न। अनायास ही उनके चेहरे पर मुस्कान की रेखाएं उभर आईं। उन्होंने कम्प्यूटर को ऑफ किया और उत्साह भरे कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ चले।
पर यह क्या? समययान के बाहर का दृश्य देखते ही वे बिलकुल अवाक रह गये। मुस्कान की रेखाओं की जगह चेहरे पर बल पड़ गये। आंखें फटी की फटी रह गयीं और मन आशंकओं के सागर में डूबने–उतराने लगा।
बाहर सिर्फ रेत ही रेत थी, अंगारों की तरह दहकती हुई रेत। आगे–पीछे, दाएं–बाएं जिधर भी दृष्टि जाती, रेत ही रेत नज़र आती। पेड़–पौधे तो दूर हरी घास का भी कहीं कोई नामो–निशान तक नहीं।
सूरज की असहनीय गर्मी और आक्सीजन की कमी से एक–एक क्षण उन्हें भारी लगने लगा। उन्हें लगा कि वे पृथ्वी पर न होकर जैसे चंद्रमा या फिर सौरमंडल के किसी अन्य ग्रह पर आ पहुंचे हो, जहां दूर–दूर तक जीवन का कोई चिन्ह मौजूद नहीं। फेस मास्क चढ़ाने के बाद वे अपनी बूढी किन्तु अनुभवी नज़रों से दूर क्षितिज के पास कुछ तलाशने लगे।
दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित शहर के अतिव्यस्ततम इलाके कररेलबाग में रहने वाले प्रोफेसर यासीन नि:संदेह आज भी करोलबाग में ही खड़े थे। पर यह करोलबाग 1900 का न होकर 2500 ईस्वी का था। और इन दोनों के बीच जीवन और मृत्यु जितना ही फासला था। जीवन के समस्त लक्षणों से रहित धरती अपनी बरबादी की तस्वीर चलचित्र के समान बयां कर रही थी। पर इस महाविनाश का जिम्मेदार कौन है? प्रकृति या स्वयं मनुष्य? इस सवाल का जवाब खोज पाने में पूर्णत: अक्षम थे प्रोफेसर यासीन।
अचानक उन्हें सामने एक चमकती हुई चीज़ नज़र आई। वह वस्तु उड़नतश्तरी की भांति आसमान से उतरी और धूल के बवंडरों को चीरती हुई धरती में समा गयी।
आशा और जीवन की मिली–जुली इस छोटी सी किरण ने प्रोफेसर का उत्साह वापस ला दिया। वे तेजी से उस स्थान की ओर चल पड़े। अपने वंशजों से मिलने की उत्सुकता ने उनके शरीर में अदभुत शक्ति का संचार कर दिया और क्षण प्रतिक्षण उनके पैरों की गति बढ़ती चली गयी।
उम्र के इस ढलवा मोड़ पर वे जितनी तेज दौड़े, उतनी तेज तो शायद वे कभी अपनी युवावस्था में भी न दौड़े होंगे। उनकी त्वचा ने शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने के प्रयास में ढ़ेर सारा पसीना उलीच दिया। होंठ प्यास के कारण सूख गये, सांसें धैंकनी की तरह चलने लगी, दिल जेट इंजन की तरह धड़कने लगा। पर वे दौड़ते ही रहे, समस्त शारीरिक बाधाओं को पार करते हुए, उस अनजान स्थान तक जल्द से जल्द पहुंच जाने के प्रयास में।
लक्ष्य पर टिकी निगाहें अचानक बीच में उभर आयी पारदर्शी कांच की दीवार देख नहीं पायीं और प्रोफेसर उससे टकरा गये। अत्यधिक श्रम से थक चुका उनका शरीर अनियंत्रित होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। तभी प्रोफेसर को एहसास हुआ कि धरती की वह सतह, जिस पर वे गिरे हैं, किसी धातु की बनी है।
अचानक एम्बुलेंस जैसी ध्वनि वातावरण में गूंजने लगी। प्रोफेसर यासीन जब तक कुछ समझते, कांच के पारदर्शी केबिन में घिर चुके थे। सूर्य की तपन के कारण बाहर लपटें सी उठती हुई प्रतीत हो रही थीं। उन्हीं लपटों के बीच दूर खड़ा था समययान, जिसे प्रोफेसर बेबस निगाहों से देखे जा रहे थे।
तभी केबिन में चारों ओर से लाल प्रकाश फूटने लगा। प्रोफेसर यासीन भी उस लाली में ऐसे समाए कि वे स्वयं ही लाल हो गये। वह लाली जब छटी, तो उन्होंने स्वयं को एक जेलनुमा पिंजरे के अन्दर पाया। सहसा पिंजरे के बाहर एक आदमकद रोबो प्रकट हुआ। उसने प्रोफेसर की ओर अपनी दाहिनी उंगली उठाई। लाल प्रकाश की एक तेज धार प्रोफेसर पर पड़ी और वे पुन: किसी अन्य स्थान के लिए ट्रांसमिट कर दिये गये।
“क्या आपके यहां मेहमानों का इसी प्रकार से स्वागत किया जाता है?” अगले दृश्य जगत में पहुंचते ही प्रोफेसर यासीन जीवित व्यक्तियों को देखकर जोर से चीखे। उन्होंने अपना मास्क पहले ही उतार लिया था।
देखने में वह स्थान किसी न्यायालय के समान ही प्रतीत हो रहा था। सामने एक ऊंची कुर्सी पर जज, अगल–बगल वकील, पीछे दर्शक और मुल्जिम के कटघरे में खड़े स्वयं प्रोफेसर यासीन। यह देखकर स्वयं प्रोफेसर भी हैरान थे कि वहां मौजूद सभी व्यक्ति धूप की तरह पीली चमड़ी वाले थे। उनके बाल भूरे तथा आंखें नीली थीं। यह बदलाव शायद वातावरणीय परिवर्तन का ही परिणाम था।
“कौन मेहमान? किसका मेहमान प्रोफेसर यासीन?” कहते हुए वकील व्यंग्यपूर्वक मुस्कराया।
वकील को अपना नाम लेता देखकर प्रोफेसर हैरान रह गये। वे अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुए बोले, “मैं और कौन?”
“आप?” वकील का हंसना बदस्तूर जारी था।
वकील की हंसी सुनकर प्रोफेसर चिड़चिड़ा गये, “मैं आपके पूर्वज की हैसियत से सन 1900 से आप लोगों के लिए दोस्ती का पैगाम लाया हूं। तो क्या मैं आप लोगों का मेहमान नहीं हुआ?”
“पीठ पर छुरा भोंकने वाले लोग दोस्त नहीं कहलाते।” वकील गरज उठा, “आप लोगों ने तो अपने वंशजों के लिए जीतेजी कब्र तैयार कर दी। ...आज हम लोग उन्हीं कब्रों में जीने के लिए अभिशप्त हैं। क्या यही है आपकी दोस्ती का तोहफा?”
“मैं कुछ समझा नहीं।” प्रोफेसर के चहरे पर आश्चर्य के भाव उग आए।
“इस समय आप जिस अदालत में खडे हैं, वह ज़मीन से दस फिट नीचे की सतह पर बनी हुई है।” वकील ने कहना शुरू किया, “प्रदूषण, आक्सीजन की कमी और सूर्य की अल्ट्रावायलेट रेज़ से बचने के लिए इसके सिवा हमारे पास कोई चारा नहीं था। आज पृथ्वी पर वृक्षों का नामोनिशान मिट चुका है, ओजोन की छतरी विलीन हो चुकी है, समुद्रों का जल स्तर बेतहाशा बढ़ गया है और आंधी तूफान तो धरती की ऊपरी सतह पर दैनिक कर्म बन गया है।”
प्रोफेसर यासीन यंत्रवत खड़े थे और वकील बोले जा रहा था, “ये सब पर्यावरण छेड़छाड़ और वृक्षों के विनाश का परिणाम है। आज हम लोग न ज्यादा हंस सकते हैं और न ज्यादा बोल सकते हैं। कृत्रिम आक्सीजन के सहारे हम जिन्दा तो हैं, पर एक मशीन बन कर रह गये हैं। ...और हमारी इस जिन्दगी के जिम्मेदार आप हैं, आपके समकालीन लोग हैं। आप लोगों ने अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए पेड़ों का नाश कर दिया, धरती को नंगा कर दिया। आप अपराधी हैं अपराधी। ऐसे अपराधी, जिसने समस्त मानवता का खून किया है। आपको सज़ा मिलनी ही चाहिए, सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए।”
कहते–कहते वकील का चेहरा क्रोध से लाल पड़ गया। वह बुरी तरह से हांफने लगा। अवश्य ही यह ऑक्सीजन की कमी का परिणाम था। यह देखकर स्वयं प्रोफेसर यासीन भी आश्चर्यचकित हुए बिना न रह सके।
“मानवीय अधिकारों की रक्षक यह अदालत मुल्जिम को अपराधी मानते हुए उसके लिए सजाए मौत का हुक्म सुनाती है।” जज की गंभीर आवाज हॉल में गूंज उठी।
प्रोफेसर कोई प्रतिवाद न कर कसे। जैसे कि उनके बोलने की क्षमता ही समाप्त हो गयी हो। उनका मस्तिष्क संज्ञा शून्य हो गया और मन अपराध बोध की सरिता में डूबता चला गया।
जल्लाद रूपी रोबो के शरीर से निकली लाल किरणों ने प्रोफेसर को अन्तिम बार ट्रांसमिट किया। जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने स्वयं को ब्लैकहोल की संवृत्त कक्षा में घूमते हुए पाया, जिसकी परिधि धीरे–धीरे कम होते हुए उसके केन्द्र की ओर जाती थी।
शरीर को अणुओं–परमाणुओं के रूप में विघटित कर देने वाले भावी विस्फोट के बारे में सोचकर ही प्रोफेसर के मुंह से भय मिश्रित चीख निकल गयी। डर के कारण उनकी आंखें अपने आप ही बंद हो गयी थीं।
लेकिन जब उनकी आंख खुली, तो न ही वहां अंतरिक्ष था और न ही ब्लैकहोल। वे अपनी प्रयोगशाला में आराम कुर्सी पर बैठे थे। उसी कुर्सी पर बैठे–बैठे ही वे स्वप्न देख रहे थे। पास में ही समययान खड़ा था, जोकि अपने आरम्भिक चरण में था।
“सर, समयचक्र की रूपरेखा तैयार हो गयी है आप आकर चेक कर लीजिए।” ये आवाज़ उनके सहायक विजय की थी।
“नहीं विजय, अभी हमें समयचक्र नहीं, बल्कि अपने समय को देखना है। अन्यथा सारा संसार जीतेजी कब्र में दफन हो जाएगा और फिर सावन के अंधे को भी हरियाली नसीब नहीं हो पाएगी।” कहते हुए प्रोफेसर यासीन दरवाजे की तरफ बढ़ गये।
प्रोफेसर का सहायक विजय आश्चर्यपूर्वक उन्हें जाते हुए देख रहा था। क्योंकि अन्य लोगों की तरह उसे भी वास्तविक ज़रूरत का एहसास नहीं हो पा रहा था।

सीतापुर हिन्दी सभा- बाल साहित्य पुरस्कार

हिन्दी सभा, सीतापुर, 0प्र0 (भारत) के 64वें वार्षिकोत्सव (वसंत पंचमी, 11 फरवरी 2008) के अवसर पर हिन्दी सभा के अध्यक्ष डा0 गणेश दत्त सारस्वत पुरस्कार प्रदान करते हुए सीतापुर।